राघव पे जनि रंग डारो री।।
राघव पे।।
कोमल गात, बयस अति थोरी,
मूरति मधुर निहारो री।।
राघव पे।।
सकुचि सभीत छिपे आँचर महँ,
कुछ तो दया विचारो री।।
राघव पे।।
विविध श्रृंगार बिरचि साजो हौं,
दृग अंजन न बिगारो री।।
राघव पे।।
बरजोरी भावत रघुवर की,
जनि पिचकारी मारो री।।
राघव पे।।
‘गिरिधर’ प्रभु की ओरी हेरी,
होली खेल सुधारो री।।
राघव पे।।
